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mahabharat 3.4.21: विदुर! मैं आपका बहुत आदर करता हूँ; किन्तु आप मुझे तरह-तरह की कपटपूर्ण सलाह दे रहे हैं। अब यह आप पर निर्भर है कि आप जाएँ या रहें। मेरा आपसे कोई सम्बन्ध नहीं है। एक कुलटा स्त्री को चाहे कितनी ही सांत्वना दी जाए, वह अपने पति को त्याग ही देती है। 21.   |   mahabharat अध्याय 3.4: विदुरजीका धृतराष्ट्रको हितकी सलाह देना और धृतराष्ट्रका रुष्ट होकर महलमें चला जाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.4.21 
स मां जिह्मं विदुर सर्वं ब्रवीषि
मानं च तेऽहमधिकं धारयामि।
यथेच्छकं गच्छ वा तिष्ठ वा त्वं
सुसान्त्व्यमानाप्यसती स्त्री जहाति॥ २१॥
 
 
अनुवाद
विदुर! मैं आपका बहुत आदर करता हूँ; किन्तु आप मुझे तरह-तरह की कपटपूर्ण सलाह दे रहे हैं। अब यह आप पर निर्भर है कि आप जाएँ या रहें। मेरा आपसे कोई सम्बन्ध नहीं है। एक कुलटा स्त्री को चाहे कितनी ही सांत्वना दी जाए, वह अपने पति को त्याग ही देती है। 21.
 
Vidura! I respect you a lot; but you are giving me all kinds of deceitful advice. Now it is up to you whether you go or stay. I have no business with you. No matter how much consolation is given to a promiscuous woman, she abandons her husband. 21.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)