श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 4: विदुरजीका धृतराष्ट्रको हितकी सलाह देना और धृतराष्ट्रका रुष्ट होकर महलमें चला जाना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.4.20 
असंशयं तेऽपि ममैव पुत्रा
दुर्योधनस्तु मम देहात् प्रसूत:।
स्वं वै देहं परहेतोस्त्यजेति
को नु ब्रूयात् समतामन्ववेक्ष्य॥ २०॥
 
 
अनुवाद
इसमें कोई संदेह नहीं कि पांडव भी मेरे ही पुत्र हैं, किन्तु दुर्योधन मेरे ही शरीर से उत्पन्न हुआ है। समता का भाव रखते हुए भी कौन किससे कहेगा कि तुम दूसरों के हित के लिए अपना शरीर त्याग दो।
 
There is no doubt that the Pandavas are also my sons, but Duryodhan was born from my body. Even with an eye on equality, who would say to whom that you should give up your body for the benefit of others.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)