श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 4: विदुरजीका धृतराष्ट्रको हितकी सलाह देना और धृतराष्ट्रका रुष्ट होकर महलमें चला जाना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  3.4.19 
इदं त्विदानीं गत एव निश्चितं
तेषामर्थे पाण्डवानां यदात्थ।
तेनाद्य मन्ये नासि हितो ममेति
कथं हि पुत्रं पाण्डवार्थे त्यजेयम्॥ १९॥
 
 
अनुवाद
इस समय आप जो कुछ कह रहे हैं, उससे यह बात तो सिद्ध हो ही गई है कि आप पाण्डवों के हित के लिए ही यहाँ आये हैं। आपके आज के व्यवहार से ही मैं समझ गया हूँ कि आप मेरे हितैषी नहीं हैं। मैं पाण्डवों के लिए अपने पुत्रों को कैसे त्याग दूँ?॥19॥
 
Whatever you are saying at this time, it is well established that you came here only for the benefit of the Pandavas. From your behavior today itself, I have understood that you are not my well-wisher. How can I give up my sons for the Pandavas?॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)