श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 39: भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति  »  श्लोक 84
 
 
श्लोक  3.39.84 
परिष्वज्य च बाहुभ्यां प्रीतात्मा भगवान् हर:।
पुन: पार्थं सान्त्वपूर्वमुवाच वृषभध्वज:॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् उसे दोनों भुजाओं से खींचकर हृदय से लगा लिया और प्रसन्नचित्त होकर वृषभचिह्न से अंकित ध्वजा धारण किए हुए भगवान रुद्र ने पुनः कुन्तीपुत्र को सान्त्वना देते हुए कहा ॥ 84॥
 
Then pulling him with both arms and embracing him close to his heart, Lord Rudra, holding a flag marked with the symbol of a bull, in a happy mood, once again consoled Kunti's son and said. ॥ 84॥
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कैरातपर्वणि महादेवस्तवे एकोनचत्वारिंशोऽध्याय:॥ ३९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कैरातपर्वमें महादेवजीकी स्तुतिसे सम्बन्ध रखनेवाला उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३९॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)