श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 39: भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  3.39.83 
वैशम्पायन उवाच
तमुवाच महातेजा: प्रहस्य वृषभध्वज:।
प्रगृह्य रुचिरं बाहुं क्षान्तमित्येव फाल्गुनम्॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी बोले, 'जनमेजय!' तब महाबली भगवान वृषभध्वज ने अर्जुन का सुन्दर हाथ पकड़कर हँसते हुए कहा, 'मैंने तुम्हारा अपराध क्षमा कर दिया है।'
 
Vaishmpayana said, 'Janamejaya! Then the mighty Lord Vrishabhadhwaj held Arjun's beautiful hand and smilingly said to him, 'I have already forgiven your offence.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)