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mahabharat 3.39.71: मैं तुम्हारे प्रति प्रेमवश तुम्हें अपना पाशुपतास्त्र प्रदान करूँगा, जिसका वेग कोई रोक नहीं सकता। तुम क्षण भर में मेरे उस अस्त्र को धारण कर सकोगे ॥71॥   |   mahabharat अध्याय 3.39: भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 39: भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  3.39.71 
प्रीत्या च तेऽहं दास्यामि यदस्त्रमनिवारितम्।
त्वं हि शक्तो मदीयं तदस्त्रं धारयितुं क्षणात्॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
मैं तुम्हारे प्रति प्रेमवश तुम्हें अपना पाशुपतास्त्र प्रदान करूँगा, जिसका वेग कोई रोक नहीं सकता। तुम क्षण भर में मेरे उस अस्त्र को धारण कर सकोगे ॥71॥
 
Out of love for you I shall give you my Pashupatastra, whose speed cannot be stopped by anyone. You will be able to wear that weapon of mine in a moment. ॥ 71॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)