श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 39: भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  3.39.65 
शरण्यं शरणं गत्वा भगवन्तं पिनाकिनम्।
मृण्मयं स्थण्डिलं कृत्वा माल्येनापूजयद् भवम्॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
फिर वह पिनाकधर भगवान शिव की शरण में गया, मिट्टी की एक वेदी बनाकर उस पर पार्थिव शिव को स्थापित किया और पुष्पों की माला से उनकी पूजा की॥65॥
 
Then he went to the refuge of Pinakadhar Lord Shiva, made an altar of clay, installed the mortal Shiva on it and worshiped him with a garland of flowers. 65॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)