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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 39: भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति
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श्लोक 44
श्लोक
3.39.44
तान् प्रसन्नेन मनसा भगवाँल्लोकभावन:।
शूलपाणि: प्रत्यगृह्णाच्छिलावर्षमिवाचल:॥ ४४॥
अनुवाद
परंतु त्रिशूलधारी भूत भगवान भव ने उन समस्त मन्त्रों को पर्वतीय पत्थरों की वर्षा के समान हर्षित हृदय से ग्रहण कर लिया ॥44॥
But the Trident-wielding Ghost Lord Bhava absorbed all those chants with a joyous heart, just like the rain of mountain stones. 44॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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