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mahabharat 3.39.41: ‘मैंने हजारों बार जो बाणों की वर्षा की है, उसका वेग पिनाकधारी भगवान शंकर के अतिरिक्त कोई भी सहन नहीं कर सकता ॥ 41॥   |   mahabharat अध्याय 3.39: भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.39.41 
न हि मद्‍बाणजालानामुत्सृष्टानां सहस्रश:।
शक्तोऽन्य: सहितुुं वेगमृते देवं पिनाकिनम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
‘मैंने हजारों बार जो बाणों की वर्षा की है, उसका वेग पिनाकधारी भगवान शंकर के अतिरिक्त कोई भी सहन नहीं कर सकता ॥ 41॥
 
'The speed of the shower of arrows which I have showered thousands of times cannot be borne by anyone except Lord Shankar holding Pinaka. ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)