श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 39: भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  3.39.38 
स दृष्ट्वा बाणवर्षं तु मोघीभूतं धनंजय:।
परमं विस्मयं चक्रे साधु साध्विति चाब्रवीत्॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
धनंजय को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसके सारे बाण व्यर्थ चले गए। वे किरात की स्तुति करने लगे और बोले-॥38॥
 
Dhananjaya was very surprised to see that all his arrows had gone in vain. He started praising Kirat and said -॥ 38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)