श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 39: भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.39.30 
दोषान् स्वान्नार्हसेऽन्यस्मै वक्तुं स्वबलदर्पित:।
अवलिप्तोऽसि मन्दात्मन्न मे जीवन् विमोक्ष्यसे॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
मूर्ख! तू अपने बल का अभिमान करके अपने दोष दूसरों पर नहीं डाल सकता। तुझे अपने बल का बड़ा अभिमान है; इसलिए अब तू मेरे हाथ से जीवित बच नहीं सकता। 30.
 
Fool! You cannot become proud of your strength and put your faults on others. You are very proud of your strength; hence now you cannot escape alive from my hands. 30.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)