श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 39: भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.39.25 
भवांस्तु कृष्णवर्त्माभ: सुकुमार: सुखोचित:।
कथं शून्यमिमं देशमेकाकी विचरिष्यति॥ २५॥
 
 
अनुवाद
तुम्हारे शरीर की कांति प्रज्वलित अग्नि के समान प्रतीत होती है। तुम कोमल हो और सुख भोगने के योग्य प्रतीत होती हो। तुम इस निर्जन स्थान में अकेली क्यों विचरण कर रही हो?॥25॥
 
‘The radiance of your body seems like that of a blazing fire. You are delicate and seem fit to enjoy happiness. Why are you wandering alone in this deserted place?’॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)