श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 39: भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.39.21 
न ह्येष मृगयाधर्मो यस्त्वयाद्य कृतो मयि।
तेन त्वां भ्रंशयिष्यामि जीवितात् पर्वताश्रयम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'आज तूने मेरे साथ जो कुछ किया है, वह शिकार का कर्तव्य नहीं है। यद्यपि तू पर्वतवासी है, फिर भी मैं उस अपराध के कारण तुझे प्राणदण्ड दूँगा।'॥21॥
 
'This is not the duty of hunting, what you have done to me today. Even though you are a resident of the mountain, I will deprive you of life for that crime.'॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)