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mahabharat 3.38.29-30: उन्होंने महादेवजी को प्रणाम किया और अर्जुन के तप-सदृश कृत्य के बारे में बताया। वे बोले - 'प्रभो! यह महाबली कुन्तीपुत्र अर्जुन हिमालय की पृष्ठभूमि पर बैठकर घोर तपस्या में लीन है तथा समस्त दिशाओं को धुएँ से ढक रहा है। हे प्रभु! हममें से कोई नहीं जानता कि वह क्या करना चाहता है।'   |   mahabharat अध्याय 3.38: अर्जुनकी उग्र तपस्या और उसके विषयमें ऋषियोंका भगवान् शंकरके साथ वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 38: अर्जुनकी उग्र तपस्या और उसके विषयमें ऋषियोंका भगवान् शंकरके साथ वार्तालाप  »  श्लोक 29-30
 
 
श्लोक  3.38.29-30 
तं प्रणम्य महादेवं शशंसु: पार्थकर्म तत्।
एष पार्थो महातेजा हिमवत्पृष्ठमास्थित:॥ २९॥
उग्रे तपसि दुष्पारे स्थितो धूमाययन् दिश:।
तस्य देवेश न वयं विद्म: सर्वे चिकीर्षितम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने महादेवजी को प्रणाम किया और अर्जुन के तप-सदृश कृत्य के बारे में बताया। वे बोले - 'प्रभो! यह महाबली कुन्तीपुत्र अर्जुन हिमालय की पृष्ठभूमि पर बैठकर घोर तपस्या में लीन है तथा समस्त दिशाओं को धुएँ से ढक रहा है। हे प्रभु! हममें से कोई नहीं जानता कि वह क्या करना चाहता है।'
 
He bowed to Mahadevji and told him about Arjun's penance-like act. He said - 'Lord! This mighty son of Kunti, Arjun, is sitting on the back side of Himalayas and is engaged in immense and intense penance and is covering all directions with smoke. Lord! None of us knows what he wants to do.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)