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mahabharat 3.38.17-18: पृथ्वी पर पुष्पों की भारी वर्षा हुई। बादल उमड़ आए और आकाश छा गया। उन दुर्गम वनों को पार करके अर्जुन हिमालय की पीठ पर एक विशाल पर्वत के पास रहने लगे। 17-18।   |   mahabharat अध्याय 3.38: अर्जुनकी उग्र तपस्या और उसके विषयमें ऋषियोंका भगवान् शंकरके साथ वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.38.17-18 
पुष्पवर्षं च सुमहन्निपपात महीतले।
मेघजालं च विततं छादयामास सर्वत:॥ १७॥
सोऽतीत्य वनदुर्गाणि संनिकर्षे महागिरे:।
शुशुभे हिमवत्पृष्ठे वसमानोऽर्जुनस्तदा॥ १८॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वी पर पुष्पों की भारी वर्षा हुई। बादल उमड़ आए और आकाश छा गया। उन दुर्गम वनों को पार करके अर्जुन हिमालय की पीठ पर एक विशाल पर्वत के पास रहने लगे। 17-18।
 
There was a heavy rain of flowers on the earth. Clouds gathered and covered the sky. Crossing those inaccessible forests, Arjuna started living near a great mountain in the back of the Himalayas. 17-18.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)