Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.38.11-13: महाराज! अत्यन्त पराक्रमी, महाबली, महाबाहु, कुरुवंश रत्न, इन्द्रपुत्र, सम्पूर्ण जगत में विख्यात महारथी और स्थिरचित्त अर्जुन, युधिष्ठिर की आज्ञा से इन्द्र और देवाधिदेव भगवान शंकर के दर्शन करने के उद्देश्य से, अपने दिव्य गाण्डीव धनुष और सुवर्णमयी तलवार को हाथ में लेकर उत्तर दिशा में हिमालय की ओर चले। | mahabharat अध्याय 3.38: अर्जुनकी उग्र तपस्या और उसके विषयमें ऋषियोंका भगवान् शंकरके साथ वार्तालाप । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
युधिष्ठिरनियोगात् स जगामामितविक्रम:।
शक्रं सुरेश्वरं द्रष्टुं देवदेवं च शंकरम्॥ ११॥
दिव्यं तद् धनुरादाय खड्गं च कनकत्सरुम्।
महाबलो महाबाहुरर्जुन: कार्यसिद्धये॥ १२॥
दिशं ह्युदीचीं कौरव्यो हिमवच्छिखरं प्रति।
ऐन्द्रि: स्थिरमना राजन् सर्वलोकमहारथ:॥ १३॥
अनुवाद
महाराज! अत्यन्त पराक्रमी, महाबली, महाबाहु, कुरुवंश रत्न, इन्द्रपुत्र, सम्पूर्ण जगत में विख्यात महारथी और स्थिरचित्त अर्जुन, युधिष्ठिर की आज्ञा से इन्द्र और देवाधिदेव भगवान शंकर के दर्शन करने के उद्देश्य से, अपने दिव्य गाण्डीव धनुष और सुवर्णमयी तलवार को हाथ में लेकर उत्तर दिशा में हिमालय की ओर चले।
King! Arjun, the immensely valiant, mighty, mighty-armed, jewel of the Kuru clan, son of Indra, who was renowned as a great warrior in the entire world and had a steady mind, by the order of Yudhishthir, with the objective of achieving the goal of seeing Lord Indra and Lord Shankar, the Lord of Gods, went northwards towards the Himalayas, holding his divine bow (Gandiva) and the golden-hilted sword in his hands.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥