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mahabharat 3.38.1: जनमेजय बोले - हे प्रभु! मैं बिना किसी प्रयास के महान् कर्म करने वाले कुन्तीपुत्र अर्जुन की कथा विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ; उसने शस्त्र कैसे प्राप्त किये?॥1॥   |   mahabharat अध्याय 3.38: अर्जुनकी उग्र तपस्या और उसके विषयमें ऋषियोंका भगवान् शंकरके साथ वार्तालाप   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 38: अर्जुनकी उग्र तपस्या और उसके विषयमें ऋषियोंका भगवान् शंकरके साथ वार्तालाप  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.38.1 
जनमेजय उवाच
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि पार्थस्याक्लिष्टकर्मण:।
विस्तरेण कथामेतां यथास्त्राण्युपलब्धवान्॥ १॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय बोले - हे प्रभु! मैं बिना किसी प्रयास के महान् कर्म करने वाले कुन्तीपुत्र अर्जुन की कथा विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ; उसने शस्त्र कैसे प्राप्त किये?॥1॥
 
Janamejaya said - O Lord! I wish to hear in detail the story of Arjuna, the son of Kunti, who performed great deeds without any effort; how did he obtain weapons?॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)