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श्लोक 3.37.51  |
ईप्सितो ह्येष वै कामो वरं चैनं प्रयच्छ मे।
त्वत्तोऽद्य भगवन्नस्त्रं कृत्स्नमिच्छामि वेदितुम्॥ ५१॥ |
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| अनुवाद |
| 'प्रभो! मैं आपसे सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ, यही मेरी अभीष्ट इच्छा है; अतः आप मुझे यह वर प्रदान करें।'॥ 51॥ |
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| 'Lord! I want to acquire the knowledge of all the weapons from you, this is my desired wish; hence grant me this boon.'॥ 51॥ |
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