श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 37: अर्जुनका सब भाई आदिसे मिलकर इन्द्रकील पर्वतपर जाना एवं इन्द्रका दर्शन करना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  3.37.47 
नेहास्ति धनुषा कार्यं न संग्रामोऽत्र कर्हिचित्।
निक्षिपैतद् धनुस्तात प्राप्तोऽसि परमां गतिम्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
'यहाँ युद्ध नहीं है, अतः तुम्हारा धनुष यहाँ व्यर्थ है। हे प्रिय! इस धनुष को यहाँ फेंक दो, अब तुम उत्तम गति को प्राप्त हो गए हो।' 47।
 
'There is no war here, so your bow is useless here. O dear! Throw this bow here, now you have attained the best destination. 47.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)