श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 37: अर्जुनका सब भाई आदिसे मिलकर इन्द्रकील पर्वतपर जाना एवं इन्द्रका दर्शन करना  »  श्लोक 45-46
 
 
श्लोक  3.37.45-46 
कस्त्वं तातेह सम्प्राप्तो धनुष्मान् कवची शरी।
निबद्धासितलत्राण: क्षत्रधर्ममनुव्रत:॥ ४५॥
नेह शस्त्रेण कर्तव्यं शान्तानामेष आलय:।
विनीतक्रोधहर्षाणां ब्राह्मणानां तपस्विनाम्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
'पिताजी! आप कौन हैं? आप क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए धनुष-बाण, कवच, तलवार और दस्तानों से सुसज्जित होकर यहाँ आए हैं। यहाँ शस्त्रों की आवश्यकता नहीं है। यह उन शान्त ब्राह्मणों का स्थान है जो क्रोध और प्रसन्नता को जीतकर तपस्या में तत्पर रहते हैं ॥ 45-46॥
 
'Father! Who are you? You have come here following the dharma of a Kshatriya, equipped with bow and arrow, armour, sword and gloves. Weapons are not required here. This is the place of the calm Brahmins who are engaged in penance, having conquered anger and happiness. ॥ 45-46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)