श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 37: अर्जुनका सब भाई आदिसे मिलकर इन्द्रकील पर्वतपर जाना एवं इन्द्रका दर्शन करना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.37.32 
बलवद्भिर्विरुद्धं न कार्यमेतत् त्वयानघ।
प्रयाह्यविघ्नेनैवाशु विजयाय महाबल।
नमो धात्रे विधात्रे च स्वस्ति गच्छ ह्यनामयम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
हे पापरहित एवं शक्तिशाली आर्यपुत्र! मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप बलवानों का विरोध न करें। विघ्नों से मुक्त होकर विजय प्राप्ति हेतु शीघ्रता से यात्रा करें। धाता और विधाता को नमस्कार है। आप सकुशल एवं स्वस्थ होकर प्रस्थान करें। ॥32॥
 
O sinless and powerful Aryaputra! I request you not to oppose the strong ones. Be free from obstacles and travel quickly to achieve victory. Salutations to Dhaata and Vidhaata. You depart safely and in good health. ॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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