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mahabharat 3.37.24-25h: द्रौपदी बोलीं, "हे महाबाहु धनंजय! हे कुन्तीपुत्र! तुम्हारे जन्म के समय कुन्ती ने तुम्हारे लिए जो भी इच्छाएँ रखी थीं, तथा तुम्हारे हृदय में जो भी इच्छाएँ हैं, उन सबकी पूर्ति हो।"   |   mahabharat अध्याय 3.37: अर्जुनका सब भाई आदिसे मिलकर इन्द्रकील पर्वतपर जाना एवं इन्द्रका दर्शन करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 37: अर्जुनका सब भाई आदिसे मिलकर इन्द्रकील पर्वतपर जाना एवं इन्द्रका दर्शन करना  »  श्लोक 24-25h
 
 
श्लोक  3.37.24-25h 
कृष्णोवाच
यत् ते कुन्ती महाबाहो जातस्यैच्छद् धनंजय॥ २४॥
तत् तेऽस्तु सर्वं कौन्तेय यथा च स्वयमिच्छसि।
 
 
अनुवाद
द्रौपदी बोलीं, "हे महाबाहु धनंजय! हे कुन्तीपुत्र! तुम्हारे जन्म के समय कुन्ती ने तुम्हारे लिए जो भी इच्छाएँ रखी थीं, तथा तुम्हारे हृदय में जो भी इच्छाएँ हैं, उन सबकी पूर्ति हो।"
 
Draupadi said, "O Mahabahu Dhananjaya, son of Kunti! Whatever wishes Kunti had for you at the time of your birth, and whatever desires you yourself may have in your heart, may you achieve them all." 24 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)