श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 37: अर्जुनका सब भाई आदिसे मिलकर इन्द्रकील पर्वतपर जाना एवं इन्द्रका दर्शन करना  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  3.37.22-23h 
क्षिप्रमाप्नुहि कौन्तेय मनसा यद् यदिच्छसि।
अब्रुवन् ब्राह्मणा: पार्थमिति कृत्वा जयाशिष:॥ २२॥
संसाधयस्व कौन्तेय ध्रुवोऽस्तु विजयस्तव।
 
 
अनुवाद
‘कुन्तीकुमार! तुम्हारे हृदय में जो कुछ भी इच्छा हो, वह तुम्हें शीघ्र ही प्राप्त हो।’ इसके बाद ब्राह्मणों ने अर्जुन को विजय का आशीर्वाद देते हुए कहा - ‘कुन्तीकुमार! तुम जो भी इच्छा करो, अवश्य ही विजय प्राप्त करोगे।’
 
'Kuntikumar! Whatever you desire in your heart, may you attain it soon.' After this the Brahmins blessed Arjuna for his victory and said - 'Kuntikumar! Do whatever you wish for, you will surely achieve victory.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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