श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 37: अर्जुनका सब भाई आदिसे मिलकर इन्द्रकील पर्वतपर जाना एवं इन्द्रका दर्शन करना  »  श्लोक 18-20
 
 
श्लोक  3.37.18-20 
निदेशाद् धर्मराजस्य द्रष्टुकाम: पुरंदरम्।
धनुर्गाण्डीवमादाय तथाक्षय्ये महेषुधी॥ १८॥
कवची सतलत्राणो बद्धगोधाङ्गुलित्रवान्।
हुत्वाग्निं ब्राह्मणान्निष्कै: स्वस्ति वाच्य महाभुज:॥ १९॥
प्रातिष्ठत महाबाहु: प्रगृहीतशरासन:।
वधाय धार्तराष्ट्राणां नि:श्वस्योर्ध्वमुदीक्ष्य च॥ २०॥
 
 
अनुवाद
धर्मराज की आज्ञा से देवराज इन्द्र के दर्शन की इच्छा से महाबली धनंजय ने अग्नि में आहुति दी और स्वर्ण मुद्राएँ दक्षिणा देकर ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवाया। वे गाण्डीव धनुष और दो महान अक्षय तूणीर साथ ले गए। उन्होंने कवच, तालत्राण (जूते) और अँगुलियों की रक्षा के लिए गौचर्म की अंगूठी धारण की। इसके बाद ऊपर की ओर देखकर और गहरी साँस लेकर महाबली अर्जुन हाथ में धनुष लेकर धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध करने के लिए वहाँ से चले गए।
 
By the order of Dharmaraja, with the desire to see Devraj Indra, the mighty Dhananjaya offered sacrifice in the fire and by giving dakshina of gold coins he made the brahmins chant Swastiva and took with him the Gandiva bow and two great Akshaya Tunirs and wore armour, taltran (shoes) and a finger ring made of cow's skin to protect his fingers. After this, looking upwards and taking a deep breath, the mighty Arjuna left from there with the bow in his hand to kill the sons of Dhritarashtra. 18-20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)