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श्लोक 3.37.1-3  |
वैशम्पायन उवाच
कस्यचित् त्वथ कालस्य धर्मराजो युधिष्ठिर:।
संस्मृत्य मुनिसंदेशमिदं वचनमब्रवीत्॥ १॥
विविक्ते विदितप्रज्ञमर्जुनं पुरुषर्षभ।
सान्त्वपूर्वं स्मितं कृत्वा पाणिना परिसंस्पृशन्॥ २॥
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा वनवासमरिंदम:।
धनंजयं धर्मराजो रहसीदमुवाच ह॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं - नरश्रेष्ठ जनमेजय! कुछ काल के पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर को व्यासजी का सन्देश स्मरण हो आया। तब उन्होंने परम बुद्धिमान अर्जुन के साथ एकान्त में वार्तालाप किया। शत्रुओं का दमन करने वाले धर्मराज युधिष्ठिर ने दो घड़ी तक वनवास के विषय में विचार करने के पश्चात् अर्जुन के शरीर को हाथ से स्पर्श किया, तथा मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए उसे एकान्त में सान्त्वना दी और इस प्रकार कहा। 1-3॥ |
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| Vaishampayanji says – Narashrestha Janamejaya! After some time, Dharmaraja Yudhishthira remembered Vyasji's message. Then he had a private conversation with the most intelligent Arjuna. Yudhishthira, the king of Dharma who suppressed the enemies, after thinking about the exile for two hours, touched Arjuna's body with his hand, smiling slightly and consoled him in private and said thus. 1-3॥ |
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