श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 36: युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुन: काम्यकवनगमन  »  श्लोक 38-39
 
 
श्लोक  3.36.38-39 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा प्रपन्नाय शुचये भगवान् प्रभु:।
प्रोवाच लोकतत्त्वज्ञो योगी विद्यामनुत्तमाम्॥ ३८॥
धर्मराजाय धीमान् स व्यास: सत्यवतीसुत:।
अनुज्ञाय च कौन्तेयं तत्रैवान्तरधीयत॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर परम बुद्धिमान सत्यवतीनन्दन, लोकतत्त्व के ज्ञाता और बलवान योगी भगवान व्यासजी ने अपनी शरण में आये हुए धर्मपरायण धर्मराज युधिष्ठिर को उस उत्तम ज्ञान का उपदेश दिया और कुन्तीकुमार की अनुमति लेकर वे पुनः वहाँ अन्तर्धान हो गये। 38-39॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Having said this, Lord Vyasji, the supremely intelligent Satyavatinandan, the knower of Lokattva and a powerful yogi, preached that excellent knowledge to the pious Dharmaraja Yudhishthira, who had come under his refuge, and after taking the permission of Kuntikumar, he disappeared there again. 38-39॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas