श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 36: युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुन: काम्यकवनगमन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.36.37 
मृगाणामुपयोगश्च वीरुदौषधिसंक्षय:।
बिभर्षि च बहून् विप्रान् वेदवेदाङ्गपारगान्॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
'यहाँ मांसाहारी पशुओं का वध पूर्ण हो चुका है और चूँकि तुम वेद-वेदांगों में पारंगत अनेक ब्राह्मणों का पालन-पोषण और यज्ञ करते हो, इसलिए यहाँ की लताएँ, झाड़ियाँ और औषधियाँ लुप्त हो गई हैं।'॥37॥
 
'The killing of the carnivorous animals here has been completed and because you support and perform sacrifices for many Brahmins who are well versed in the Vedas and Vedangas, the creepers, bushes and medicinal herbs here have vanished.'॥ 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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