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mahabharat 3.36.33-34: 'प्राचीन ऋषि, महाप्रतापी पुरुष, जिनके मित्र भगवान नारायण हैं, वे अर्जुन हैं। वे सनातन देव हैं, अजेय हैं, विजयी हैं और अपनी मर्यादा से कभी विचलित नहीं होंगे। महाबली अर्जुन इंद्र, रुद्र आदि लोकपालों से दिव्यास्त्र प्राप्त करके महान् कार्य करेंगे।॥ 33-34॥   |   mahabharat अध्याय 3.36: युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुन: काम्यकवनगमन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 36: युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुन: काम्यकवनगमन  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  3.36.33-34 
ऋषिरेष महातेजा नारायणसहायवान्।
पुराण: शाश्वतो देवस्त्वजेयो जिष्णुरच्युत:॥ ३३॥
अस्त्राणीन्द्राच्च रुद्राच्च लोकपालेभ्य एव च।
समादाय महाबाहुर्महत् कर्म करिष्यति॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
'प्राचीन ऋषि, महाप्रतापी पुरुष, जिनके मित्र भगवान नारायण हैं, वे अर्जुन हैं। वे सनातन देव हैं, अजेय हैं, विजयी हैं और अपनी मर्यादा से कभी विचलित नहीं होंगे। महाबली अर्जुन इंद्र, रुद्र आदि लोकपालों से दिव्यास्त्र प्राप्त करके महान् कार्य करेंगे।॥ 33-34॥
 
‘The ancient sage and the great and illustrious man whose friend is Lord Narayana is Arjuna. He is the eternal god, invincible, victorious and will never deviate from his dignity. The powerful Arjuna will perform great deeds after obtaining divine weapons from Indra, Rudra and other Lokpalas.॥ 33-34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)