श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 36: युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुन: काम्यकवनगमन  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.36.21 
वैशम्पायन उवाच
एतद् वचनमाज्ञाय भीमसेनोऽत्यमर्षण:।
बभूव विमनास्त्रस्तो न चैवोवाच किंचन॥ २१॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! युधिष्ठिर के ये वचन सुनकर अत्यन्त क्रोधित भीमसेन दुःखी और संशयग्रस्त हो गये। फिर वे कुछ भी नहीं बोले।
 
Vaishampayana says- Janamejaya! On hearing these words of Yudhishthira, Bhimasena who was very angry became sad and doubtful. Then he did not utter a word.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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