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mahabharat 3.36.18: उस ओर महाबली कर्ण है, जो सदैव हमारे प्रति क्रोध और आक्रोश से भरा रहता है। वह सभी अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता, अजेय और अभेद्य कवच से सुरक्षित है।   |   mahabharat अध्याय 3.36: युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुन: काम्यकवनगमन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 36: युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुन: काम्यकवनगमन  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.36.18 
अमर्षी नित्यसंरब्धस्तत्र कर्णो महारथ:।
सर्वास्त्रविदनाधृष्यो ह्यभेद्यकवचावृत:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
उस ओर महाबली कर्ण है, जो सदैव हमारे प्रति क्रोध और आक्रोश से भरा रहता है। वह सभी अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता, अजेय और अभेद्य कवच से सुरक्षित है।
 
On that side is the mighty warrior Karna, who is always filled with resentment and anger against us. He is an expert in all weapons, invincible and protected by an impenetrable armour.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)