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mahabharat 3.36.15-16: महाबाहो! यद्यपि पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण और महामना कृपाचार्य का आन्तरिक स्नेह धृतराष्ट्र के पुत्रों और हम लोगों के प्रति एक ही है, तथापि वे राजा दुर्योधन का दिया हुआ अन्न खाते हैं, अतः मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि वे उसका ऋण अवश्य चुकाएँगे। युद्ध होने पर वे भी दुर्योधन के पक्ष में लड़ेंगे और अपने कष्टसाध्य प्राणों का त्याग करेंगे॥ 15-16॥   |   mahabharat अध्याय 3.36: युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुन: काम्यकवनगमन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 36: युधिष्ठिरका भीमसेनको समझाना, व्यासजीका आगमन और युधिष्ठिरको प्रतिस्मृतिविद्याप्रदान तथा पाण्डवोंका पुन: काम्यकवनगमन  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  3.36.15-16 
समा यद्यपि भीष्मस्य वृत्तिरस्मासु तेषु च।
द्रोणस्य च महाबाहो कृपस्य च महात्मन:॥ १५॥
अवश्यं राजपिण्डस्तैर्निर्वेश्य इति मे मति:।
तस्मात् त्यक्ष्यन्ति संग्रामे प्राणानपि सुदुस्त्यजान्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
महाबाहो! यद्यपि पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण और महामना कृपाचार्य का आन्तरिक स्नेह धृतराष्ट्र के पुत्रों और हम लोगों के प्रति एक ही है, तथापि वे राजा दुर्योधन का दिया हुआ अन्न खाते हैं, अतः मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि वे उसका ऋण अवश्य चुकाएँगे। युद्ध होने पर वे भी दुर्योधन के पक्ष में लड़ेंगे और अपने कष्टसाध्य प्राणों का त्याग करेंगे॥ 15-16॥
 
Mahabaho! Although the inner affection of Grandfather Bhishma, Acharya Drona and Mahamana Kripacharya is the same for Dhritarashtra's sons and us, yet they eat the food given by King Duryodhan, so it seems to me that they will surely repay his debt. When the war breaks out, they too will fight on Duryodhan's side and sacrifice their difficult lives.॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)