श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 34: धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहनेकी घोषणा  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.34.22 
मम प्रतिज्ञां च निबोध सत्यां
वृणे धर्मममृताज्जीविताच्च।
राज्यं च पुत्राश्च यशो धनं च
सर्वं न सत्यस्य कलामुपैति॥ २२॥
 
 
अनुवाद
परन्तु भीमसेन! मेरी सच्ची प्रतिज्ञा सुनो। मैं धर्म को जीवन और अमरता से भी अधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ। राज्य, पुत्र, यश और धन- ये सब सच्चे धर्म के सोलहवें स्वरूप को भी प्राप्त नहीं कर सकते।
 
But Bhimasena! Listen to my true vow. I consider Dharma to be more important than life and immortality. Kingdom, son, fame and wealth - all these cannot even attain the sixteenth aspect of true Dharma.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये चतुस्त्रिंशोऽध्याय:॥ ३४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें युधिष्ठिरवाक्यविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३४॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)