Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.34.20: जब कोई वीर पुरुष अपने शत्रु के द्वारा धोखा खाकर यह जान लेता है कि वह फल-फूल रहा है और अपने प्रयत्नों से उसे उखाड़ फेंकता है, तब वह उस शत्रु के महान गुणों को छीन लेता है और इस संसार में सुखपूर्वक रहने लगता है। | mahabharat अध्याय 3.34: धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहनेकी घोषणा । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यदा हि पूर्वं निकृतो निकृन्तेद्
वैरं सपुष्पं सफलं विदित्वा।
महागुणं हरति हि पौरुषेण
तदा वीरो जीवति जीवलोके॥ २०॥
अनुवाद
जब कोई वीर पुरुष अपने शत्रु के द्वारा धोखा खाकर यह जान लेता है कि वह फल-फूल रहा है और अपने प्रयत्नों से उसे उखाड़ फेंकता है, तब वह उस शत्रु के महान गुणों को छीन लेता है और इस संसार में सुखपूर्वक रहने लगता है।
When a brave man, having been deceived by his enemy, finds out that he is flourishing and uproots him by his efforts, then he snatches the great qualities of that enemy and lives happily in this world.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥