यदा हि पूर्वं निकृतो निकृन्तेद्
वैरं सपुष्पं सफलं विदित्वा।
महागुणं हरति हि पौरुषेण
तदा वीरो जीवति जीवलोके॥ २०॥
अनुवाद
जब कोई वीर पुरुष अपने शत्रु के द्वारा धोखा खाकर यह जान लेता है कि वह फल-फूल रहा है और अपने प्रयत्नों से उसे उखाड़ फेंकता है, तब वह उस शत्रु के महान गुणों को छीन लेता है और इस संसार में सुखपूर्वक रहने लगता है।
When a brave man, having been deceived by his enemy, finds out that he is flourishing and uproots him by his efforts, then he snatches the great qualities of that enemy and lives happily in this world.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)