श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 34: धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहनेकी घोषणा  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.34.2 
युधिष्ठिर उवाच
असंशयं भारत सत्यमेतद्
यन्मां तुदन् वाक्यशल्यै: क्षिणोषि।
न त्वां विगर्हे प्रतिकूलमेव
ममानयाद्धि व्यसनं व आगात्॥ २॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "भरतपुत्र! यह निःसंदेह उचित ही है कि तुम मुझे कष्ट दे रहे हो और अपने वचनों से मेरे हृदय को छेद रहे हो। यद्यपि ये बातें मेरे विरुद्ध हैं, फिर भी मैं इनके लिए तुम्हें दोष नहीं देता; क्योंकि मेरे ही अन्याय के कारण तुम लोगों पर यह विपत्ति आई है।"
 
Yudhishthira said, "Son of Bharat's clan! It is undoubtedly right that you are tormenting me and piercing my heart with your words. Even though these things are against me, I do not blame you for these things; because it is my injustice that has brought this calamity upon you people."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)