श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 34: धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहनेकी घोषणा  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.34.18 
भूयोऽपि दु:खं मम भीमसेन
दूये विषस्येव रसं हि पीत्वा।
यद् याज्ञसेनीं परिक्लिश्यमानां
संदृश्य तत् क्षान्तमिति स्म भीम॥ १८॥
 
 
अनुवाद
भीमसेन! मुझे भी इस बात का बड़ा दुःख है कि द्रौपदी पर शत्रुओं द्वारा अत्याचार हो रहा था और हम लोग अपनी आँखों से देखकर भी चुपचाप सह रहे थे। जैसे कोई विष पीकर पीड़ा से कराहने लगता है, उसी प्रकार मैं इस समय उसी पीड़ा को सह रहा हूँ॥18॥
 
Bhimsena! I am also very saddened by the fact that Draupadi was being tortured by the enemies and we bore it silently even after seeing it with our own eyes. Just like someone drinks poison and starts groaning in pain, I am suffering the same pain at this time.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)