श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 34: धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहनेकी घोषणा  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  3.34.16-17 
तदैव चेद् वीर कर्माकरिष्यो
यदा द्यूते परिघं पर्यमृक्ष:।
बाहू दिधक्षन् वारित: फाल्गुनेन
किं दुष्कृतं भीम तदाभविष्यत्॥ १६॥
प्रागेव चैवं समयक्रियाया:
किं नाब्रवी: पौरुषमाविदान:।
प्राप्तं तु कालं त्वभिपद्य पश्चात्
किं मामिदानीमतिवेलमात्थ॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वीर भीमसेन! जब तुमने द्यूतक्रीड़ा के समय मेरी दोनों भुजाएँ भस्म करने की इच्छा प्रकट की और अर्जुन ने तुम्हें रोका, तब तुम शत्रुओं पर आक्रमण करने के लिए अपनी गदा चलाने लगे। यदि तुम उस समय शत्रुओं पर आक्रमण करते, तो कितना बड़ा अनर्थ हो जाता। तुम अपना पुरुषार्थ जानते थे। मेरे उपर्युक्त व्रत लेने से पहले तुमने ऐसा क्यों नहीं कहा? जब मैंने व्रत के अनुसार वनवास का समय स्वीकार कर लिया है, तब अब तुम मुझसे ऐसी कठोर बातें क्यों कह रहे हो?॥16-17॥
 
Brave Bhimasena! When you expressed your desire to burn both my arms during the game of dice and Arjuna stopped you, you started swinging your mace to attack the enemies. If you had attacked the enemies at that time, how much disaster would have happened. You knew your manliness. Why did you not say such a thing before I started taking the above mentioned vow? When I have accepted the time of exile as per the vow, then why are you saying such harsh things to me now?॥16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)