श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 34: धर्म और नीतिकी बात कहते हुए युधिष्ठिरकी अपनी प्रतिज्ञाके पालनरूप धर्मपर ही डटे रहनेकी घोषणा  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.34.13 
तत्र द्यूतमभवन्नो जघन्यं
तस्मिञ्जिता: प्रव्रजिताश्च सर्वे।
इत्थं तु देशाननुसंचरामो
वनानि कृच्छ्राणि च कृच्छ्ररूपा:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
फिर हमने वहाँ अन्तिम निंदनीय जुआ खेला। उसमें हम सब हार गए और अपना घर छोड़कर वन में चले गए। इस प्रकार हम दुःखदायी वेश धारण करके दुःखदायी वनों और नाना लोकों में घूम रहे हैं॥13॥
 
Then we played the last reprehensible gamble there. We all lost in it and left our homes and went to the forest. In this way we are roaming around in painful forests and various regions wearing painful disguises.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)