न हि गाण्डीवमुक्तानां शराणां गार्ध्रवाससाम्।
स्पर्शमाशीविषाभानां मर्त्य: कश्चन संसहेत्॥ ८७॥
अनुवाद
'मनुष्यों में ऐसा कोई नहीं है जो गाण्डीव धनुष से छोड़े गए विषैले सर्पों के समान भयंकर गीध पंख वाले बाणों के स्पर्श को सहन कर सके।
'Amongst men there is no one who can withstand the touch of the vulture-feathered arrows which are as dreadful as the poisonous serpents shot from the Gāṇḍīva bow.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥