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श्लोक 3.33.73  |
न तथा तपसा राजँल्लोकान् प्राप्नोति क्षत्रिय:।
यथा सृष्टेन युद्धेन विजयेनेतरेण वा॥ ७३॥ |
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| अनुवाद |
| धर्मराज! क्षत्रिय को तपस्या से वे पुण्यलोक प्राप्त नहीं होते जो उसे युद्ध में विजय प्राप्त करने से अथवा मृत्यु को स्वीकार करने से प्राप्त होते हैं॥ 73॥ |
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| 'Dharmaraja! A kshatriya does not attain the virtuous worlds through austerity, which he gets by winning the war or accepting death as prescribed for him.॥ 73॥ |
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