श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 70
 
 
श्लोक  3.33.70 
सर्वथा संहतैरेव दुर्बलैर्बलवानपि।
अमित्र: शक्यते हन्तुं मधुहा भ्रमरैरिव॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
‘जैसे मधुमक्खियाँ संगठित होकर शहद निकालने वाले को मार डालती हैं, वैसे ही बलवान शत्रु को भी संगठित रहकर दुर्बल मनुष्य मार डालते हैं ॥70॥
 
‘Just as honey bees unite and kill the person extracting honey, similarly a strong enemy can also be killed by weak people who remain completely united. ॥ 70॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)