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श्लोक 3.33.70  |
सर्वथा संहतैरेव दुर्बलैर्बलवानपि।
अमित्र: शक्यते हन्तुं मधुहा भ्रमरैरिव॥ ७०॥ |
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| अनुवाद |
| ‘जैसे मधुमक्खियाँ संगठित होकर शहद निकालने वाले को मार डालती हैं, वैसे ही बलवान शत्रु को भी संगठित रहकर दुर्बल मनुष्य मार डालते हैं ॥70॥ |
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| ‘Just as honey bees unite and kill the person extracting honey, similarly a strong enemy can also be killed by weak people who remain completely united. ॥ 70॥ |
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