श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  3.33.67 
एवमेव मनुष्येन्द्र धर्मं त्यक्त्वाल्पकं नर:।
बृहन्तं धर्ममाप्नोति स बुद्ध इति निश्चितम्॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
'नरेश्वर ! इसी प्रकार जो पुरुष तुच्छ धर्म को त्यागकर उत्तम धर्म को प्राप्त करता है, वह निश्चय ही बुद्धिमान है ॥67॥
 
'Nareshwar! Similarly, the person who abandons the lesser religion and attains the great religion is certainly intelligent. 67॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)