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mahabharat 3.33.66: 'जहाँ किसी अर्थ का प्रयोग किसी बड़े या समान अर्थ की प्राप्ति के लिए न किया जा सके, वहाँ उस अर्थ का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह दो गधों के शरीरों को खुजलाने के समान व्यर्थ है।' 66.   |   mahabharat अध्याय 3.33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 66
 
 
श्लोक  3.33.66 
अर्थेन तु समो नार्थो यत्र लभ्येत नोदय:।
न तत्र विपण: कार्य: खरकण्डूयनं हि तत्॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
'जहाँ किसी अर्थ का प्रयोग किसी बड़े या समान अर्थ की प्राप्ति के लिए न किया जा सके, वहाँ उस अर्थ का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह दो गधों के शरीरों को खुजलाने के समान व्यर्थ है।' 66.
 
'Where a meaning cannot be used to achieve a greater or the same meaning, that meaning should not be used because it is as futile as the scratching of two donkeys' bodies. 66.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)