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श्लोक 3.33.58  |
न हि केवलधर्मात्मा पृथिवीं जातु कश्चन।
पार्थिवो व्यजयद् राजन्न भूतिं न पुन: श्रियम्॥ ५८॥ |
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| अनुवाद |
| महाराज! आज तक कोई भी राजा जो केवल धर्मपरायण था, न तो पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर सका है और न ही उसने धन और ऐश्वर्य प्राप्त किया है॥ 58॥ |
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| ‘Maharaj! Till date no king who devoted himself only to Dharma has ever conquered the Earth nor has he attained wealth and prosperity.॥ 58॥ |
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