श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.33.57 
स क्षात्रं हृदयं कृत्वा त्यक्त्वेदं शिथिलं मन:।
वीर्यमास्थाय कौरव्य धुरमुद्वह धुर्यवत्॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
'कुरुनन्दन! अपने हृदय में क्षत्रिय का उत्साह भर लो, मन की इस आलस्य को दूर कर दो, वीरता का आश्रय लो और वीर योद्धा की भाँति युद्ध का भार उठाओ।
 
'Kurunandan! Fill your heart with the zeal of a Kshatriya, remove this lethargy of your mind and take recourse to valour and bear the burden of the war like a valiant warrior.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)