श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  3.33.56 
तस्मादपचित: पार्थ लोके हास्यं गमिष्यसि।
स्वधर्माद्धि मनुष्याणां चलनं न प्रशस्यते॥ ५६॥
 
 
अनुवाद
पार्थ! यदि तुम उस धर्म से रहित हो, तो संसार में उपहास के पात्र बनोगे। मनुष्यों का अपने धर्म से विमुख होना शोभा नहीं देता ॥ 56॥
 
‘Partha! If you are devoid of that religion, you will become a laughing stock in the world. It is not praiseworthy for people to deviate from their religion. ॥ 56॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)