श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  3.33.53 
उदारमेव विद्वांसो धर्मं प्राहुर्मनीषिण:।
उदारं प्रतिपद्यस्व नावरे स्थातुमर्हसि॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
‘ज्ञानी विद्वान् लोग दान को ही धर्म कहते हैं, अतः तुम्हें उस दान को प्राप्त करना चाहिए। तुम्हें इस दयनीय स्थिति में नहीं रहना चाहिए॥ 53॥
 
‘The wise scholars call charity as Dharma, therefore you should acquire that charity. You should not live in this pitiable state.॥ 53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)