श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  3.33.51 
भैक्ष्यचर्या न विहिता न च विट्शूद्रजीविका।
क्षत्रियस्य विशेषेण धर्मस्तु बलमौरसम्॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
क्षत्रिय के लिए न तो भिक्षा मांगना नियम है और न वैश्य या शूद्र के समान जीविका कमाना ही धर्म है। उसके लिए बल और उत्साह ही विशेष धर्म हैं॥ 51॥
 
‘For a Kshatriya, neither begging is the rule nor earning a livelihood like a Vaishya or Shudra. For him, strength and enthusiasm are the special religion.॥ 51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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