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श्लोक 3.33.51  |
भैक्ष्यचर्या न विहिता न च विट्शूद्रजीविका।
क्षत्रियस्य विशेषेण धर्मस्तु बलमौरसम्॥ ५१॥ |
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| अनुवाद |
| क्षत्रिय के लिए न तो भिक्षा मांगना नियम है और न वैश्य या शूद्र के समान जीविका कमाना ही धर्म है। उसके लिए बल और उत्साह ही विशेष धर्म हैं॥ 51॥ |
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| ‘For a Kshatriya, neither begging is the rule nor earning a livelihood like a Vaishya or Shudra. For him, strength and enthusiasm are the special religion.॥ 51॥ |
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