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mahabharat 3.33.45: मैं जानता हूँ कि तुम सदैव धर्म के मार्ग पर ही चले हो। यह जानते हुए भी तुम्हारे शुभचिंतक और सम्बन्धी तुम्हें धर्मकर्म करने और पुरुषार्थ करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं॥ 45॥   |   mahabharat अध्याय 3.33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  3.33.45 
विदितश्चैव मे धर्म: सततं चरितश्च ते।
जानन्तस्त्वयि शंसन्ति सुहृद: कर्मचोदनाम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
मैं जानता हूँ कि तुम सदैव धर्म के मार्ग पर ही चले हो। यह जानते हुए भी तुम्हारे शुभचिंतक और सम्बन्धी तुम्हें धर्मकर्म करने और पुरुषार्थ करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं॥ 45॥
 
'I know that you have always followed the path of righteousness. Despite knowing this, your well-wishers and relatives encourage you to perform (righteous) deeds and make efforts.॥ 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)