श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  3.33.36 
तस्य नाशे विनाशे वा जरया मरणेन वा।
अनर्थ इति मन्यन्ते सोऽयमस्मासु वर्तते॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
‘जब मनुष्य के पास वह धन नहीं रहता, अथवा उसका अर्जित धन नष्ट हो जाता है, अथवा जब उसकी स्त्री आदि धन जीर्ण-शीर्ण होकर नष्ट हो जाते हैं, तब उसकी जो दशा होती है, उसे सभी लोग विपत्ति ही मानते हैं। इस समय हमने भी यही अनुभव किया है॥ 36॥
 
‘The condition of a man when he lacks that wealth or when the wealth he has acquired is destroyed or when his wife and other wealth become old and worn out and die, is considered by everyone as a disaster. We have also experienced the same at this time.॥ 36॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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