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mahabharat 3.33.28: ‘इसीलिए विद्वान पुरुष धर्म और अर्थ की सिद्धि में कभी प्रमाद नहीं करते। धर्म और अर्थ काम के उत्पत्ति स्थान हैं (अर्थात् धर्म और अर्थ से ही काम की प्राप्ति होती है) जैसे अरणि अग्नि की उत्पत्ति का स्थान है।॥28॥   |   mahabharat अध्याय 3.33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 33: भीमसेनका पुरुषार्थकी प्रशंसा करना और युधिष्ठिरको उत्तेजित करते हुए क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्ध छेड़नेका अनुरोध  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.33.28 
तस्माद् धर्मार्थयोर्नित्यं न प्रमाद्यन्ति पण्डिता:।
प्रकृति: सा हि कामस्य पावकस्यारणिर्यथा॥ २८॥
 
 
अनुवाद
‘इसीलिए विद्वान पुरुष धर्म और अर्थ की सिद्धि में कभी प्रमाद नहीं करते। धर्म और अर्थ काम के उत्पत्ति स्थान हैं (अर्थात् धर्म और अर्थ से ही काम की प्राप्ति होती है) जैसे अरणि अग्नि की उत्पत्ति का स्थान है।॥28॥
 
‘That is why learned men never commit negligence in the fulfillment of Dharma and Artha. Dharma and Artha are the places of origin of Kama (i.e. Kama is achieved through Dharma and Artha only) like Arani is the place of origin of fire.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)